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जीतते- जीतते कैसे भाजपा हार गयी दादरा और नगर हवेली?

नई दिल्ली:

लोकसभा चुनाव 2019 जैसे बड़े चुनावों में अक्सर बड़े-बड़े राजनेताओं और राजनीतिज्ञों से शायद ही आपने दादरा और नगर हवेली जैसी लोकसभा सीटो के बारे में सुना होगा। भारत का सबसे बड़ा चुनावी मंच जन की बात दादरा और नगर हवेली पहुँचा। जो कि गुजरात और महाराष्ट्र के बीच एक केंद्रशासित प्रदेश है। बात यदि हम यहां चुनाव की करे तो यहां मुख्य मुकाबला पिछले दो बार से सांसद भाजपा के नाथुभाई पटेल और छ: बार के पूर्व सांसद मोहनभाई देलकर में था। जिन्होंने हाल ही में कांग्रेस छोड़ी थी और निर्दलीय चुनावी मैदान में थे। मोहनभाई के कांग्रेस छोड़ने के साथ ही वह मुख्य मुकाबले से बाहर हो गयी थी।

यदि पिछले चुनाव से निकले समीकरणों की बात करें तो यहां जीत का अंतर बेहद कम था। जो 2009 में 618 और मोदी लहर 2014 में बढ़कर 6,214 हो गया। जो कि यह संकेत कर रहा था कि यहां लड़ाई कांटे की रहने वाली है।

यदि नेताओं की छवि की बात करें तो पिछले दो बार से सांसद नाथुभाई पटेल की छवि अच्छे नेता की थी। वहीं मोहनभाई की छवि इलाके के दबंग नेता की थी। जिनका प्रभाव मुख्यता ग्रामीण और आदिवासी लोगो में ज्यादा था।

नाथुभाई पटेल के काम की बात करें तो जनता से मुख्यत: पानी की पाइपलाइन, कानून व्यवस्था में सुधार, सड़क जैसी बातें सुनने को मिलती है।

इलाके में जातीय समीकरण की बात करें तो यहां पर 50% से अधिक लोग आदिवासी समुदाय से है। जिनमे वर्लिएस, कोळी, कोंकण मुख्य है। जबकि 25% आबादी बाहरी और 25% से अधिक ईसाई और मुस्लिम समुदाय से है।

एक तरफ जहां देश मे मोदी सुनामी की गूंज जमीन पर दिखाई दे रही थी यह स्थिति दादरा और नगर हवेली में भी थी। यहां तो भाजपा उम्मीदवार के साथ-साथ निर्दलीय उम्मीदवार मोहनभाई देलकर भी जीतने के बाद भाजपा में शामिल होने की बात कह कर वोट मांग रहे थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि मोहनभाई देलकर को ग्रामीण आदिवासी के साथ-साथ शहरी वोट भी मिला। जबकि नाथुभाई पटेल को 10 साल की विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा था। इसी वहज से जन की बात ने अपने सर्वेक्षण में निर्दलीय उम्मीदवार मोहनभाई देलकर को आगे दिखाया जो कि नतीजो में सही सिद्ध हुआ।

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