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त्रिपुरा चुनाव में चुनाव ख़त्म होने के साथ प्रमुख पार्टियों की किस्मत हुई बैलट में कैद

2014 में जब पूरे भारत में 10 साल की कांग्रेस सरकार के बाद जो बदलाव की हवा चली थी, उसी हवा ने इस बार रूख किया है त्रिपुरा का। त्रिपुरा में बीतीं 18 फरवरी को विधानसभा चुनाव हुए है और इन चुनावों में त्रिपुरा की जनता ने बहुत कुछ देखा और सहा है। दरअसल, इस साल के त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में एक अजीब सी कसक थी क्योकि बीते 25 सालों से अपनी पकड़ बनाए बैठी रहने वाली सीपीआईएम को नरेन्द्र मोदी ने खुद दौरा करके चुनौती दी। 91 फीसद मतदान प्रतिशत देने वाले त्रिपुरा ने इस साल मतदान के दिन शाम 7 बजे तक 76 प्रतिशत वोटिंग कि लेकिन शाम के 7 बजे के बाद ये मतदान प्रतिशत अचानक बढ़ कर 89.96 प्रतिशत पर पहुॅच गई। त्रिपुरा में इस साल पुरूषों के मतदान के प्रतिशत की संख्या करीब 88.46 रही जबकि महिलाओं ने इस साल भी मतदान में अपना सिक्का चलाते हुए 89.46 प्रतिशत की संख्या दर्ज कराई। 18 फरवरी को सुबह 8 बजे से शुरू हुए विधानसभा चुनाव कुछ जगह ईवीएम खराब होने के चलते रात में करीब 12 बजे तक चलते रहे।
2018 के विधानसभा चुनाव त्रिपुरा के इतिहास को शायद बदल सकते है क्योकि प्रदेश में पहली बार भाजपा ने अपना हाथ आज़माया है और जन की बात के ओपिनियन पोल के मुताबिक भाजपा इस साल 37 से 31 सीट पर अपनी जीत दर्ज करा सकती है। लेकिन चुनाव के दिन खोवाई, रामचन्द्र घाट, बनामालीपुर, सोनामुरा, सिमना जैसे कुछ क्षेत्रों में ईवीएम खराब होने के चलते वोट देने आए कुछ लोग तो परेशान होकर घर चले गए तो कुछ लोग सुबह से शाम तक लाइन में लगकर अपने वोटिंग अधिकार का इस्तेमाल करने का इंतजार करते नज़र आए। बता दें कि त्रिपुरा में मौजूदा 60 विधानसभाओं में से बीजेपी ने 51 सीटों पर चुनाव लड़े जबकि आईपीएफटी की एलांयस के साथ सभी 60 सीटों पर चुनाव लड़े जबकि सीपीआईएम इस बार 57 सीटों पर अपना भाग्य आज़माती हुई नज़र आई थी।
चुनाव प्रचार शुरू होने के साथ शुरू होकर मतदान के दिन तक चलने वाली इस चुनावी सरगर्मी की गर्माहट तो पूरे प्रदेश की जनता ने महसूस कि है। पर इस चुनावी सरगर्मी के तापमान का नतीजा तो 3 मार्च को ही जनता के समक्ष पेश होगा और उसी दिन पता चलेगा त्रिपुरा की बागडोर अगले पांच साल किसके हाथो में रहेगी।

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