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जापन “कर्म” का श्रेष्ठ उदाहरण

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हमारे धर्म ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिल जाता हैं कि “कर्म ही पूजा हैं”,जब मनुष्य अपने कर्म को पूरी श्रद्धा के साथ उसे सम्पन्न करने में लग जाता हैं तो निश्चय ही उसे सफलता मिलती हैं.
अर्थात जिस तरह श्रद्धा भक्ति व तन्मयता के साथ पूजा होती हैं वही निष्ठा कार्य के प्रति रखी जानी चाहिए.निरंतर कार्य में लगा रहना ही सच्ची सफलता का सूत्र हैं. कार्य रुपी वृक्ष पर सही समय पर कामयाबी के पुष्प पल्लवित होते हैं, जीवन में कार्य ही सच्ची पूजा एवं साधना हैं, भगवान श्रीकृष्ण गीता के कर्मयोग में कार्य का महत्व बताते हुए कहते हैं मनुष्य को निरंतर कर्मशील बने रहना चाहिए, उसे फल की चिंता करने की बजाय अपने कार्य पर ध्यान देना चाहिए.मनुष्य को ईश्वर ने हाथ, पैर,म स्तिष्क प्रदान कर पृथ्वी पर भेजा हैं,उ नसे इस लोक की सरंचना इस तरह से की हैं कि हमें अपनी जरुरतो को पूर्ण करने के लिए कर्म करने की आवश्यकता पडती ही हैं,इसलिए हमें ईश्वर ने ये ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेंद्रिय दी हैं.हम किस तरह के कर्म करे अथवा हमें कहाँ तक सफलता मिलेगी.यह उस काम के प्रति हमारी ईमानदारी और समर्पण भाव पर निर्भर करता हैं.कार्य के बिना हमारी थाली में सजा खाना हमारे मुहं तक नहीं आ सकता, जीवन कर्म के बिन अकर्मण्य बन जाता हैं,इसे उपयोगी बनाने में कर्म की बड़ी भूमिका हैं.जीवन में निरंतर कार्य करते रहना ही मानव का प्रथम कर्तव्य माना गया हैं,आलस्य, निद्रा,सुस्ती को कर्म का शत्रु व जीवन का अभिशाप माना गया हैं.ये मानव के व्यक्तित्व विकास के बाधक हैं.अपने जीवन में सफलता की बुलंदियां स्पर्श करने वाले व्यक्तियों ने कार्य के महत्व को समझा है तथा कार्य के लिए स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित करने पर ही उन्होंने वह मुकाम अर्जित किया हैं.भाग्य, किस्मत अथवा ईश्वर भी उनके के साथ चलते हैं जो कर्म करने में संकोच नहीं करता हैं.यदि आप भी निरंतर प्रयासरत है अपने लक्ष्य की ओर तो आप सफलता रुपी प्याले में निरंतर अमृत रस जमा कर रहे हैं,जो एक दिन आपके लिए फल के रूप में छलकेगा.हम अपने जीवन में जो कुछ प्रगति या विकास के कारनामे देखते अथवा सुनते हैं उनके पीछे कार्य और सिर्फ कार्य जुड़ा होता हैं.

वर्तमान समय में कर्म ही पूजा है का श्रेष्ठ उदाहरण के लिए जापान को लिया जा सकता हैं.द्वितीय विश्व युद्ध में जापान ने अपने दो सर्वाधिक विकसित महानगरों को परमाणु की विभीषिका से ख़ाक होते देखा,उस समय जापान की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई,अपने इतिहास के काले अध्याय को भुलाकर केवल कर्म के दम पर आज वह विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्रों में गिना जाता हैं.जापानियों ने अपनी तबाही को भाग्य का लिखा मानने की बजाय,फिर से उठ खड़े हुए और कर्म के महत्व को अपने जीवन में सिद्ध कर दिखाया कि यदि मानव कुछ करने की ठान ले तो एक दिन वह सब कुछ प्राप्त कर सकता हैं,उसके लिए कुछ ही असम्भव नहीं हैं,निरंतर अपने कार्य में लगने वाले के पास सफलता तो उलटे पाँव भागी आती हैं. व्यक्ति यदि अपने कार्यों को शुद्ध अंतकरण से करना शुरू कर दे तो उनकी विफलताएं भी कामयाबी बनकर आती हैं,जीवन में हमें कभी काम करने से जी नहीं चुराना चाहिए बल्कि कम समय में अधिक से अधिक कार्य करने का यत्न करना चाहिए, क्योंकि परिश्रम अथवा कार्य ही सफलता के मूल तंत्र हैं.

 

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Abhishek Kumar
Abhishek Kumar
Abhishek kumar Has 4 Year+ experience in journalism Field. Visit his Twitter account @abhishekkumrr

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