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40% युवाओं को नही पता 1975 की इमरजेंसी क्या है

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40% युवाओं को नही पता 1975 की इमरजेंसी क्या है

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25 जून 1975 की तत्तकालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब आर्टिकल 352 के तहत देश में इमरजेंसी लगाने का ऐलान किया तो हर तरफ खलबली मच गई। राजनेताओं और उनके कार्यकर्ताओं को बंदी बनाया जाने लगा, अखबारों से उनकी स्वतंत्रता छीन ली गई, सिनेमा पर सेंसरशिप का ठप्पा लगने लगा। देश की हर छोटी बड़े फैसले को सरकार अपने मुताबिक लेने लगी, नागरिकों से उनके मूलभूत अधिकार छीन लिये गए थे। किसी को भी मार दिया जाता था, किसी को भी जेल में डाल दिया जाता था। ह्यूमन राइट आर्गेनाइजेशन की रिर्पोट के मुताबिक 1975 की इमरजेंसी के दौरान करीबन 1 लाख 40 हज़ार भारतीयों को बिना किसी जांच-पड़ताल के जेल में बंद कर दिया गया था और करीब 1 करोड़ विवाहित, अविवाहित, वृद्ध, जवान, अधेड़ पुरूषों की जबरन नसबंदी करा दी गई। जबलपुर के एडीएम ने अपने आदेश में कहा था कि आपातकाल में संविधान के आर्टिकल 19 के तहत स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार खत्म हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर मुहर लगा दी। यहॉं तक कहा गया कि किसी निर्दोष को गोली भी मार दी जाए तो भी अपील नहीं हो सकती क्योंकि आर्टिकल 21 के तहत जीने के आधिकार भी खत्म हो चुके हैं, लिहाजा जुल्म की इंतेहा ही हो गई। बता दें कि इमरजेंसी के बहुत बाद एक इंटरव्यू में इंदिरा ने कहा था कि उन्हें लगता था कि भारत को शॉक ट्रीटमेंट की जरूरत है।

देश के सबसे काले दौर को भारतीय जनता पार्टी ने 26 जून को याद करते हुए ट्वीटर पर एक विडियो पोस्ट किया जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वॉइस ओवर सुनाई देता है। विडियों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते है, ‘‘लाखों देशभक्तों को, लोकतंत्र प्रेमियों को जेलों में बंद कर दिया गया था। अखबारों पर तालें लग गए थे, रेडियो वही बोलता था जो सरकार बोलती थी‘‘। 26 जून 2018 को भाजपा के राष्ट्रीय ट्वीटर हेंडल ने विडियो पोस्ट किया तो भाजपा के बाकि नेताओं और प्रवक्ताओं ने भी ट्वीट करे लेकिन इसी के साथ आम जनता ने भी ट्वीट करना शुरू कर दिया। कोई कांग्रेस पार्टी और इंदिरा गांधी की अवेहलना करता तो कोई तथ्यों के बिनाह पर इस इमरजेंसी का व्याख्यान अपने शब्दों में करता। वहीं अगर बात कांग्रेस पार्टी की करें तो उन्होने इस विडियो की जवाबदेही में कहा कि भारत में इस वक्त अघोषित इमरजेंसी जैसी स्थिति है।

कांग्रेस के इस ब्यान के बाद ट्वीटर पर कांग्रेस और भाजपा के समर्थकों के बीच बहस छिड़ गई और इसी बहस को इंटरनेट से उतार कर जन की बात फाउंडर सीईओ प्रदीप भंडारी ने जनता के बीच जन चौपाल के माध्यम से रखा और जाने उनसे उनकी राय कि क्या इस वक्त भारत में अघोषित इमरजेंसी के हालात है या ये सिर्फ राजनितिक प्रोपेगंडा है।

दिल्ली की जनता के बीच हुई जन चौपाल में मौजूद 40 प्रतिशत यूथ को ये तक नही पता था कि इमरजेंसी है क्या, तो वहीं चौपाल में मौजूद 50 वर्षीय या उससे उपर की उम्र वाले लोगो ने इमरजेंसी के उस दौर को लोकतंत्र के सबसे काले दौर के तौर पर याद किया। चौपाल के दौरान जब जन की बात टीम ने देश के युवाओं से पूछा कि क्या उन्हे लगता है कि आज देश की स्थिति इमरजेंसी वाली है तो अधिकतर का जवाब ना ही रहा लेकिन कुछ ऐसे भी युवा थे जो इमरजेंसी के उस काले दौर को एटीएम में पैसे ना होने और प्रदूषण से तुलना कर रहे थे। जो कहीं ना कहीं युवाओं के बीच देश के असल मुद्दो को लेकन बढ़ रही अज्ञानता को दर्शाता है।