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मनोज बाजपेई की इस फिल्म में कोई प्रोड्यूसर पैसे लगाने को तैयार नहीं था।

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मनोज बाजपेई की नई फिल्म भोंसले आ रही है जो कि प्रवासियों पर आधारित है। इस फिल्म में महाराष्ट्र में कैसे प्रवासियों को एजेंडा के तहत परेशान किया गया था उसका भी जवाब है। इस फिल्म को लेकर जन की बात के रिपोर्टर नितेश दूबे ने मनोज बाजपेई से विशेष बातचीत की और टीम ने जाना कि आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है जो दर्शकों के लिए खास है। मनोज बाजपेई से खास बातचीत का एक अंश:-

प्रश्न- सबसे पहले आप बताइए कि भोंसले फिल्म क्या है? किस पर आधारित है।

मनोज बाजपेई-  भोंसले फिल्म 64 साल के रिटायर्ड पुलिस वाले पर आधारित है। एक आदमी जो किसी तनाव में है। ऐसा आदमी जो कि बाहर की दुनिया से कोई कनेक्शन नहीं चाहता ,अकेलेपन से जूझ रहा है लेकिन उसे ड्यूटी चाहिए। लोकल वर्सेस बाहरी का मुद्दा इसको एक दिशा देता है जिससे यह उसको अपने जीवन की ओर खींच लेता है।

प्रश्न- इस फिल्म के डायरेक्टर देवाशीष मखीजा हैं। लेकिन इस फिल्म का सफर काफी लंबा चला, 10 साल क्यों लग गए?

मनोज बाजपेई- यह फिल्म 2010 में बननी शुरू हुई थी लेकिन 2014 में देवाशीष मखीजा पहली बार मेरे पास आए थे। उनको कोई प्रोड्यूसर नहीं मिल रहा था क्योंकि इस फिल्म की स्क्रिप्ट ही ऐसी थी। मैंने उनको वादा किया कि आपको मैं एक प्रोड्यूसर लाकर दूंगा। लेकिन जो भी प्रोड्यूसर यह स्क्रिप्ट पढ़ता था वह तुरंत फिल्म छोड़ देता था क्योंकि उसे डर था कि उसे पॉलीटिकल पार्टियों की मार झेलनी पड़ेगी। फिर एक प्रोड्यूसर ने इसके लिए पैसे जुटाए लेकिन 10 दिन की शूटिंग के बाद पैसे खत्म हो गए। फिर मैंने कई प्रोड्यूसर को फोन किया और बाद में संदीप कपूर ने (जिन्होंने अनारकली ऑफ आरा बनाई) अगले दिन ही हामी भर ली और पैसे भेज दिए। इसलिए इस फिल्म का रिलीज होना मेरे लिए काफी बड़ी सफलता है और देवाशीष मखीजा जो कि इस फिल्म के डायरेक्टर हैं उनके लिए भी बड़ी सफलता है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि फिल्में बनाना और फिल्में पूरा करना आसान काम नहीं है। इसके लिए बहुत ही धैर्य और मेहनत की जरूरत होती है।

इस दौरान मनोज बाजपेई ने कहा कि जिस को स्क्रिप्ट से प्यार है ,जिसको एक्टिंग से प्यार है उनको यह फिल्म देखना चाहिए। क्योंकि लोग शिकायत करते हैं कि मार्केट में अच्छी फिल्में क्यों नहीं आ रही है तो उनको ये फिल्म देखना चाहिए।

प्रश्न (संदीप कपूर से) – जैसा कि मनोज जी ने बताया कि कोई प्रोड्यूसर इस फिल्म में पैसा लगाने को तैयार नहीं था तो आपने इसमें पैसा क्यों लगाया?

उत्तर- आपको बता दें कि जब मनोज जी कोई फिल्म करते हैं उनका फोन आता है कि मैं फिल्म कर रहा हूं तो मैं ज्यादा कुछ देखता नहीं। क्योंकि जो शख्स 50 स्क्रिप्ट पढ़ कर एक फिल्म फाइनल करता है तो वो कुछ अच्छा ही सोच रहा है। इसलिए जब मनोज जी कुछ कहते हैं तो मैं तुरंत मान लेता हूं।

प्रश्न- मनोज जी ऐसा कहा जा रहा है कि फिल्म में आपका भी पैसा लगा है इसमें कितनी सच्चाई है और तांडव से इस फिल्म का क्या रिलेशन है?

मनोज बाजपेई- देखिए ऐसा है कि इस फिल्म में मैंने अपनी नॉर्मल फिल्मों से कम पैसे लिए हैं। दूसरी बात इस फिल्म को पूरा करने के लिए मैंने अपनी जान लगा दी है तो मेहनत इसमें मैंने काफी की है। इन सब को देखते हुए सारे टीम के साथियों ने सोचा कि वह मुझे को-प्रोड्यूसर का दर्जा देंगे। साथ ही जब फिल्म अच्छा करेगी तो कमाई का कुछ हिस्सा भी मुझे देंगे।

दूसरी बात तांडव की- तांडव इससे अलग फिल्म है उसमें भी एक हवलदार ही था लेकिन उसकी उम्र 40 साल के आसपास थी लेकिन इसमें 64 साल का है। लेकिन दोनों पिक्चरों की कहानी अलग है।

प्रश्न- ओटीटी पर भोंसले जैसी फिल्मों को न्याय मिलेगा क्योंकि जब स्क्रिप्ट बेस फिल्में आती है तो ऑडिएंस लिमिटेड हो जाती है।

मनोज बाजपेई- देखिए भोंसले जैसी फिल्मों को न्याय ओटीटी पर ही मिलेगा। क्योंकि ओटीटी को डेमोक्रेटिक प्लेटफार्म कह सकते हैं। जब से हमने भोंसले का ट्रेलर डाला है तब से काफी अच्छा ट्रैक्शन आ रहा है जो इस फिल्म की ओर दर्शकों को खींचेगा। क्योंकि लोग ऐसी फिल्मों को देखना चाहते हैं और इसलिए वह भोंसले पिक्चर को देखेंगे। हालांकि हम थिएटर में भी रिलीज करने की सोच रहे हैं लेकिन उसमें काफी माथापच्ची भी है।

लेकिन मैं मानता हूं कि कॉन्टेंट अच्छा होगा तो दर्शक फिल्म की ओर खींचा हुआ आएगा। हमने 1971 बनाई, फैमिली मैन बनाई दर्शकों ने उसको खूब सारा प्यार दिया। मुझे पूरा विश्वास है कि भोंसले उससे भी अच्छा करेगी।

प्रश्न- इस फिल्म में प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को दिखाया गया है, क्या ये फिल्म बहुत सारे सवाल छोड़ती है?

मनोज बाजपेई- आपको बता दें कि यह फिल्म सवाल नहीं बल्कि जवाब देकर की जाती है। एक समय प्रवासियों पर काफी सवाल उठाया गया था महाराष्ट्र में एजेंडा के तहत।  तो उसकी असलियत क्या थी उसका जवाब यह फिल्म देती है।

इस फिल्म में हमने काफी सारी cost-cutting भी की है। कई जगह हमने इसमें रिकॉर्डिंग का भी इस्तेमाल किया है। एक बार लालबाग के राजा के विसर्जन के दौरान टोपी, कुर्ता, पजामा पहन निकल गया था। वो सीन भी फिल्म में इस्तेमाल किया गया है और उस दौरान मुझे वहां पर कोई पहचान भी नहीं पाया था।

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