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73वें गणतंत्र दिवस पर 17 साल की मासूम लावण्या के न्याय की लड़ाई ही हमारे सच्चे गणतंत्र को साबित करेगी

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विपिन श्रीवास्तव, जन की बात

आज देश अपना 73 वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, देश भर में जश्न का माहौल है, लेकिन आज मैं आपको कुछ बताना चाहता हूं, एक मासूम बच्ची की पीड़ा बताना चाहता हूं। एक 17 साल की मासूम बच्ची जो 12वीं कक्षा में पढ़ती थी, हज़ारों सपने थे उसके, पढ़ने में इतनी तेज थी कि पिछली परीक्षा में उसने 500 में से 485 अंक हासिल किए थे, हो सकता कुछ वर्षों बाद ऐसे ही गणतंत्र दिवस के उत्सव में बो मासूम लावण्या हमें गणतंत्र दिवस की परेड में सेना के किसी जत्थे का नेतृत्व करती नजर आ जाती, जैसे आज बीएसएफ की सीमा भवानी ने मोटरसाइकिल पर डेयरडेविल फॉर्मेशन की अगुआई की, और हम सब को गर्व से भर दिया लेकिन अफसोस कि लावण्या ऐसा नहीं कर सकी, वो हार गई दोस्तों, अपने ही देश में अपने धर्म के लिए समर्पित होने की वजह से उसकी जान चली गयी, 9 जावरी को तमिलनाडु के तंजावुर में सेक्रेड हार्ट हायर सेकेंडरी स्कूल में कक्षा 12वीं की इस मासूम छात्र ने मिशनरी स्कूल की प्रताड़ना से तंग आकर कीटनाशक खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की, और 10 दिन तक अस्पताल में ज़िन्दगी और मौत से जूझने के बाद उसने आख़िर जिंदगी से हार मान ली और चली गई।

उसका कसूर सिर्फ इतना था कि मिशनरी स्कूल द्वारा जबरन धर्मांतरण के लिए उंसने इनकार कर दिया, जिसके बाद उसे लगातार प्रताड़ित किया गया, उसके गरीब लाचार परिवार को प्रताड़ित किया गया, उस मासूम बच्ची से स्कूल की सफाई कराई गई, उससे स्कूल का शौचालय तक साफ काराया गया, जिसके बाद आख़िर उसने हार मान ही ली।

दोस्तों, आज गणतंत्र दिवस है और इसी देश में आज एक गरीब मासूम परिवार गणतंत्र को ढूंढता हुआ दर दर भटक रहा है, वो परिवार अपने सीने पर अपनी 17 साल की मासूम बच्ची की मौत का सदमा लेकर भटक रहा है, लेकिन यकीन मानिये उस मासूम 17 साल की बच्ची मि मौत का बोझ सिर्फ उस गरीब लाचार परिवार पर नहीं है, बल्कि हम सब पर है, इस पूरे गणतंत्र पर है, हमारे संविधान पर है, और सबसे ज्यादा देश के उस तबके पर है जो संविधान की दुहाई भी धर्म और जात देखकर देते हैं….

दोस्तों इस देश का संविधान जिसमें देश के सभी नागरिकों को एकता और समानता का अधिकार देने की बात कही जाती है वो तब झूठा लगने लगता है, जब अखलाख अहमद और पहलु खान के न्याय लिए तो एक पूरी लिबरल जमात एक हो जाती है, लेकिन मासूम लावण्या के न्याय के लिए उनके मुँह से एक शब्द तक नहीं निकलता, सिर्फ इसलिए क्योंकि वो मासूम एक हिन्दू थी ?

दलित वोटर्स को लुभाने के लिए ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ, का नारा देने वाली प्रियंका गाँधी और उनके भाई राहुल गाँधी रोहित वेमुला के न्याय के लिए ट्वीट करते हैं, लेकिन एक मासूम हिन्दू लड़की के परिवार के न्याय के लिए उनसे एक शब्द नहीं लिखा जाता, सिर्फ इसलिए क्योंकि उस मासूम के लिए बोलने से गाँधी परिवार को चुनाव में कोई फायदा नहीं होगा?

हमारा संविधान जिसके आर्टिकल 21 से इस देश में सभी को जीने का अधिकार प्राप्त है, जिसमें आर्टिकल 25 में देश के सभी नागरिकों को अपने धर्म को मैंने और उसका विधि विधान से पालन करने का अधिकार प्राप्त है, उसी संवैधानिक देश में एक 17 साल की मासूम सिर्फ इसलिए आत्महत्या कर लेती है क्योंकि उसके और उसके परिवार के ऊपर ईसाई मिशनरियों द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जा रहा था।

लावण्या की मौत सिर्फ इस वजह से हुई क्योंकि वो एक गरीब हिन्दू परिवार से थी जिसने ईसाई धर्म के लालच को त्यागकर अपना धर्म अपनाये रखने की हिम्मत की। लावण्या की मौत सिर्फ इस वजह से हुई क्योंकि उसके अंदर अपने धर्म के प्रति सच्ची ईमानदारी और श्रद्धा थी।

लावण्या की मौत सिर्फ इस वजह से हुई क्योंकि उसको पैसों और अन्य चीजों की लालच से ज्यादा अपने धर्म और संस्कृति से प्यार था। लावण्या की मौत सिर्फ इस वजह से आवाज नहीं उठाते हैं तो हम भी इस गणतंत्र देश में उस मासूम के हत्यारे ही कहलायेंगे। इस गणतंत्र दिवस के मौके पर हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम एक 17 साल की मासूम हिन्दू लड़की के घरवालों को न्याय दिला सकें, तब ही हमारे गणतंत्र का असली महत्व बरकरार हो पायेगा।

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Sombir Sharma
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Sombir Sharma - Journalist

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